भारत के 71 वें स्वतंत्रता दिवस पर दो शब्द
स्वतंत्रता का सम्मान और उसकी हिफाजत सवतंत्रता के बोध से पैदा होती है | हम कामना करते हैं कि लोगों के अंदर यह बोध इस दिवस पर पैदा हो | विदेशी ताकतें हमेशा स्वतंत्रता के बोध को समाप्त करने के लिए भ्रमित (confuse) करने, गलत परिभाषित और गलत विश्लेषण करने की नौकरी कुछ लोगों को देती रही हैं | इस मुल्क में जिनको स्वतंत्रता चाहिए उन्होंने ले ली और जो लोग यह मान बैठे कि वे महापुरुषों के वंशज हैं इसलिए उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं वे व्यवस्था में हर जगह से बेदखल होते जा रहे हैं और गुलाम होते जा रहे | स्वतंत्रता किससे चाहिए और किसलिए चाहिए ? जिससे स्वतंत्रता चाहिए वह क्या है: व्यक्ति या व्यवस्था ? वह कौन सा काम है जिसको हम स्वतंत्रता पूर्वक करना चाहते हैं ? कौन सी गुलामी ज्यादा खतरनाक है: मानसिक या भौतिक (शारीरिक) ?
एक उदहारण से बात समझ में आ जाये | कार की फैक्ट्री में कार ही बनती है और घड़ी की फैक्ट्री में घड़ी बनती है | फैक्ट्री एक व्यवस्था है; जैसा परिणाम चाहिए उसके हिसाब से व्यवस्था बनानी पड़ती है | इसलिए आपेक्षित परिणाम के आधार पर बनायीं गयी व्यवस्था यानि कार और घड़ी की फैक्ट्री अलग-अलग है |
भारत में जैसा नेता चाहिए वैसी चुनावी व्यवस्था बनाई गयी | यह चुनावी व्यवस्था डा आम्बेडकर ने नहीं बनाया है; इसे संविधान सभा की बहस को देखकर पता किया जा सकता है कि किसने इस व्यवस्था को बनवाया और किसने क्या विरोध किया | जैसे विद्वान चाहिए वैसी शिक्षा व्यवस्था बनायीं गयी; और शिक्षा का परिणाम हम खुद हैं और हमारे सामने बहुत सारे लोग एवं आने वाली पीढ़ी भी है | जैसा विकास चाहिए वैसी आर्थिक व्यवस्था बनायीं गयी; किसी की दैनिक मजदूरी एक करोड़ है तो किसी को औसतन रु० 2०/- प्रतिदिन भी नहीं मिलते है | जैसा शासन चाहिए वैसी प्रसाशनिक व्यवस्था बनायीं गयी | जैसा न्याय चाहिए वैसी न्यायिक व्यवस्था बनायी गयी | जैसी व्यवस्था बनायीं गयी वैसा ही परिणाम हो रहा है | किसने यह व्यवस्था बनायी और क्या उसको मार देने से यह व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी ? नहीं | लेकिन हम मरने या मारने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं करना चाहते हैं; और जब हम यह काम करते हैं तो बहुत सारे कानून हमारा पीछा करने लगते हैं | सबसे बड़ी गुलामी यही है कि हम मरने-मारने, शास्त्रार्थ, गुणगान, पूजा-पाठ, विषय से हटकर कापी-पेस्ट, अफवाहों एवं हिंसा के प्रचार-प्रसार के आलावा कुछ नहीं कर सकते | कुछ थोड़े से लोग स्वतन्त्र हैं जो कुछ व्यवस्था को समझने का प्रयास करते हैं; बाबासाहेब के साथ भी थोड़े से थे और आज भी थोड़े से ही हैं | हमारे बिच में भी कुछ ऐसे हैं जो अपनी मेहनत के बदौलत आज किसी हद तक सक्षम हैं |
इस मुल्क में समानांतर सरकारें चलती हैं | जिनको जो व्यवस्था चाहिए उसके लिए वे अपना समय और संसाधन खर्च करके सरकार से बात-चित करके अपना काम करवा लेते हैं; बजट, नियम, कानून और संविधान में सशोधन भी करवा लेते हैं | विपक्ष नहीं चाहेगा कि हम भी स्वतंत्रता पूर्वक इस तरह का कार्य करें और यदि हम विपक्ष की इन उम्मीदों पर खरा उतारते हैं तो यह भी एक बड़ी गुलामी है |
हम स्वतंत्र तो हैं लेकिन विधायी जवाबदेही (Legislative Accountability) क्या है और कहाँ है ? जब प्रश्न विधायी जवाबदेही का आएगा तो भारत का हर नागरिक स्वभावत: ही हाँ कहने लगेगा: चाहे मुर्ख हो विद्वान | लेकिन इस राग को छेड़ेगा कौन: क्या वे जिनको जरूरत है या वे जिनको इसकी जरुरत नहीं है ? क्या हम सब यह मानते हैं कि विधायी जिम्मेदारियों के अंदर यह सब काम आते हैं : विमुद्रीकरण, मध्यान्ह भोजन, निजीकरण, सरकारी नौकरियों में आने से SC/ST/OBC को रोकना, अनाज को सड़ा कर फेंक देना, जल-जंगल-जमीन उद्योगपतियों को कौड़ी के भाव बांटना, विदेशों में रूपया जमा करना, रुपये का मूल्य गिराते जाना, चुनाव में धांधली के लिए बैलेट पेपर हटाकर EVM मशीन लाना, ऐसी व्यवस्था बनाना जिससे सरकारी अस्पतालों में मासूम बच्चे मर जाएँ (जैसे गोरखपुर में हुआ), शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा, धार्मिक उन्मांद फैलाना, दलित/आदिवासी/मुस्लिम पर अत्याचार को बढ़ावा देना ........... ऐसे हजारो कार्य हैं | पिछड़े वर्ग और सुरक्षित चुनाव क्षेत्रों से चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों की क्या विधायी जवाबदेही है ?
स्वतंत्रता का बोध और इसका सम्मान सर्वोपरि है और इसे होना चाहिए | हम कामना करते हैं कि इसका बोध सभी नागरिकों के अंदर हो और हम यह जाने कि किस व्यवस्था से किस तरह के मानवीय स्वभावों को चुना जाता है या प्रतिबंधित किया जाता है और वह किस तरह से मनुष्यता के हित में और देश हित में है |
महेश कुमार
Jila Adhyaksh
Mobile: 7015401075, 9813232656,
स्वतंत्रता का सम्मान और उसकी हिफाजत सवतंत्रता के बोध से पैदा होती है | हम कामना करते हैं कि लोगों के अंदर यह बोध इस दिवस पर पैदा हो | विदेशी ताकतें हमेशा स्वतंत्रता के बोध को समाप्त करने के लिए भ्रमित (confuse) करने, गलत परिभाषित और गलत विश्लेषण करने की नौकरी कुछ लोगों को देती रही हैं | इस मुल्क में जिनको स्वतंत्रता चाहिए उन्होंने ले ली और जो लोग यह मान बैठे कि वे महापुरुषों के वंशज हैं इसलिए उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं वे व्यवस्था में हर जगह से बेदखल होते जा रहे हैं और गुलाम होते जा रहे | स्वतंत्रता किससे चाहिए और किसलिए चाहिए ? जिससे स्वतंत्रता चाहिए वह क्या है: व्यक्ति या व्यवस्था ? वह कौन सा काम है जिसको हम स्वतंत्रता पूर्वक करना चाहते हैं ? कौन सी गुलामी ज्यादा खतरनाक है: मानसिक या भौतिक (शारीरिक) ?
एक उदहारण से बात समझ में आ जाये | कार की फैक्ट्री में कार ही बनती है और घड़ी की फैक्ट्री में घड़ी बनती है | फैक्ट्री एक व्यवस्था है; जैसा परिणाम चाहिए उसके हिसाब से व्यवस्था बनानी पड़ती है | इसलिए आपेक्षित परिणाम के आधार पर बनायीं गयी व्यवस्था यानि कार और घड़ी की फैक्ट्री अलग-अलग है |
भारत में जैसा नेता चाहिए वैसी चुनावी व्यवस्था बनाई गयी | यह चुनावी व्यवस्था डा आम्बेडकर ने नहीं बनाया है; इसे संविधान सभा की बहस को देखकर पता किया जा सकता है कि किसने इस व्यवस्था को बनवाया और किसने क्या विरोध किया | जैसे विद्वान चाहिए वैसी शिक्षा व्यवस्था बनायीं गयी; और शिक्षा का परिणाम हम खुद हैं और हमारे सामने बहुत सारे लोग एवं आने वाली पीढ़ी भी है | जैसा विकास चाहिए वैसी आर्थिक व्यवस्था बनायीं गयी; किसी की दैनिक मजदूरी एक करोड़ है तो किसी को औसतन रु० 2०/- प्रतिदिन भी नहीं मिलते है | जैसा शासन चाहिए वैसी प्रसाशनिक व्यवस्था बनायीं गयी | जैसा न्याय चाहिए वैसी न्यायिक व्यवस्था बनायी गयी | जैसी व्यवस्था बनायीं गयी वैसा ही परिणाम हो रहा है | किसने यह व्यवस्था बनायी और क्या उसको मार देने से यह व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी ? नहीं | लेकिन हम मरने या मारने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं करना चाहते हैं; और जब हम यह काम करते हैं तो बहुत सारे कानून हमारा पीछा करने लगते हैं | सबसे बड़ी गुलामी यही है कि हम मरने-मारने, शास्त्रार्थ, गुणगान, पूजा-पाठ, विषय से हटकर कापी-पेस्ट, अफवाहों एवं हिंसा के प्रचार-प्रसार के आलावा कुछ नहीं कर सकते | कुछ थोड़े से लोग स्वतन्त्र हैं जो कुछ व्यवस्था को समझने का प्रयास करते हैं; बाबासाहेब के साथ भी थोड़े से थे और आज भी थोड़े से ही हैं | हमारे बिच में भी कुछ ऐसे हैं जो अपनी मेहनत के बदौलत आज किसी हद तक सक्षम हैं |
इस मुल्क में समानांतर सरकारें चलती हैं | जिनको जो व्यवस्था चाहिए उसके लिए वे अपना समय और संसाधन खर्च करके सरकार से बात-चित करके अपना काम करवा लेते हैं; बजट, नियम, कानून और संविधान में सशोधन भी करवा लेते हैं | विपक्ष नहीं चाहेगा कि हम भी स्वतंत्रता पूर्वक इस तरह का कार्य करें और यदि हम विपक्ष की इन उम्मीदों पर खरा उतारते हैं तो यह भी एक बड़ी गुलामी है |
हम स्वतंत्र तो हैं लेकिन विधायी जवाबदेही (Legislative Accountability) क्या है और कहाँ है ? जब प्रश्न विधायी जवाबदेही का आएगा तो भारत का हर नागरिक स्वभावत: ही हाँ कहने लगेगा: चाहे मुर्ख हो विद्वान | लेकिन इस राग को छेड़ेगा कौन: क्या वे जिनको जरूरत है या वे जिनको इसकी जरुरत नहीं है ? क्या हम सब यह मानते हैं कि विधायी जिम्मेदारियों के अंदर यह सब काम आते हैं : विमुद्रीकरण, मध्यान्ह भोजन, निजीकरण, सरकारी नौकरियों में आने से SC/ST/OBC को रोकना, अनाज को सड़ा कर फेंक देना, जल-जंगल-जमीन उद्योगपतियों को कौड़ी के भाव बांटना, विदेशों में रूपया जमा करना, रुपये का मूल्य गिराते जाना, चुनाव में धांधली के लिए बैलेट पेपर हटाकर EVM मशीन लाना, ऐसी व्यवस्था बनाना जिससे सरकारी अस्पतालों में मासूम बच्चे मर जाएँ (जैसे गोरखपुर में हुआ), शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा, धार्मिक उन्मांद फैलाना, दलित/आदिवासी/मुस्लिम पर अत्याचार को बढ़ावा देना ........... ऐसे हजारो कार्य हैं | पिछड़े वर्ग और सुरक्षित चुनाव क्षेत्रों से चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों की क्या विधायी जवाबदेही है ?
स्वतंत्रता का बोध और इसका सम्मान सर्वोपरि है और इसे होना चाहिए | हम कामना करते हैं कि इसका बोध सभी नागरिकों के अंदर हो और हम यह जाने कि किस व्यवस्था से किस तरह के मानवीय स्वभावों को चुना जाता है या प्रतिबंधित किया जाता है और वह किस तरह से मनुष्यता के हित में और देश हित में है |
महेश कुमार
Jila Adhyaksh
Mobile: 7015401075, 9813232656,

Comments
Post a Comment